मंदिर में स्थापित देव प्रतिमाएँ

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श्री हनुमान जी

“अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं, दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्‌।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं, रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥ ”

हनुमान जी (बजरंगबली) शक्ति, भक्ति, ज्ञान और सेवा के प्रतीक हैं। भगवान शिव के 11वें रुद्रावतार माने जाने वाले हनुमान जी, केसरी नंदन और माता अंजना के पुत्र हैं। वे भगवान राम के परम भक्त हैं, जिन्हें 'चिरंजीवी' (अमर) माना जाता है। हनुमान जी को संकट मोचन कहा जाता है, जो जीवन की बाधाएं दूर करते हैं।

श्री राम दरबार

“ॐ रां रामाय नमः |
" जा पर कृपा राम की होई, ता पर कृपा करहिं सब कोई। ”

श्री राम दरबार भगवान राम की शिक्षाओं में निहित आदर्श पारिवारिक मूल्यों का एक सशक्त प्रतीक है। अपनी विभिन्न गतिविधियों और पहलों के माध्यम से, दरबार व्यक्तियों और परिवारों को प्रेम, आदर, कर्तव्य और निस्वार्थता जैसे गुणों को अपनाने के लिए प्रेरित करता है।

श्री गणेश जी

“ वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥ ”

भगवान गणेश, जिन्हें गणपति, विनायक और विघ्नहर्ता के रूप में जाना जाता है, हिंदू धर्म में सबसे लोकप्रिय और प्रथम पूजनीय देवता हैं। वे शिव और पार्वती के पुत्र हैं, जिनका स्वरूप ज्ञान, बुद्धि और समृद्धि का प्रतीक है। गजमुख (हाथी का सिर) बुद्धि, बड़े कान धैर्यपूर्ण श्रवण, और लंबी सूंड उच्च दक्षता का संदेश देती है।

उन्हें सभी देवताओं में प्रथम पूजनीय माना जाता है, जो किसी भी कार्य में आने वाली विघ्न-बाधाओं को दूर करते हैं। ज्ञान, कला और विज्ञान के वे अधिपति हैं, और वे शिक्षा व बुद्धिमत्ता के दाता भी माने जाते हैं।

माँ सरस्वती

“ सरस्वति नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणि, विद्यारम्भं करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा | ”

माँ सरस्वती ज्ञान, संगीत, कला, बुद्धि और वाणी की अधिष्ठात्री देवी हैं, जिन्हें श्वेत वस्त्र, वीणा, पुस्तक और हंस के साथ ज्ञान की प्रकाष्ठा के रूप में पूजा जाता है। वे ब्रह्मा जी की शक्ति मानी जाती हैं और ब्रह्मा जी के मुख से प्रकट होकर सृष्टि में विद्या और कला का संचार करती हैं।

श्वेत वस्त्र और रूप: माँ सरस्वती श्वेत वस्त्र धारण करती हैं, जो शुद्धता, पवित्रता और ज्ञान की सादगी को दर्शाता है।

वीणा (वीणाधारिणी): उनके हाथों में वीणा है, जो संगीत, कला और विद्या की मधुरता का प्रतीक है।

पुस्तक (पुस्तकधारिणी): हाथ में पुस्तक ज्ञान और शिक्षा का प्रतीक है।

हंस (वाहन): उनका वाहन हंस है, जो विवेक और बुद्धि (नीर-क्षीर विवेक - अच्छे-बुरे की पहचान) का प्रतीक माना जाता है।

श्वेत कमल: वे अक्सर सफेद कमल पर विराजमान रहती हैं, जो पवित्रता का प्रतीक है।

माँ दुर्गा

“ सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणी नमोऽस्तुते।। ”

नवरात्रि के पावन दिनों में मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है:  
शैलपुत्री: पहला रूप (हिमालय की पुत्री)।
ब्रह्मचारिणी: तपस्या करने वाली।
चंद्रघंटा: घंटे के आकार के अर्धचंद्र वाली।
कूष्मांडा: ब्रह्मांड को उत्पन्न करने वाली।
स्कंदमाता: कार्तिकेय (स्कंद) की माता।
कात्यायनी: कात्यायन ऋषि की पुत्री।
कालरात्रि: दुष्टों का विनाश करने वाली।
महागौरी: सफेद और शांत रूप।
सिद्धिदात्री: हर प्रकार की सिद्धि देने वाली।

श्री राधा-कृष्ण

“ नमस्ते परमेशानि रासमण्डलवासिनी। रासेश्वरि नमस्तेऽस्तु कृष्ण प्राणाधिकप्रिये।। ”

राधे-कृष्ण का संबंध निस्वार्थ प्रेम, सर्वोच्च भक्ति और आध्यात्मिकता का सर्वोच्च प्रतीक है। राधाजी को कृष्ण की आंतरिक शक्ति (ह्लादिनी शक्ति) और सर्वोच्च देवी माना जाता है, जो कृष्ण को भी मोहित करती हैं। वे प्रेम, करुणा और कोमलता की अवतार हैं, और कृष्ण के बिना उनका अस्तित्व नहीं माना जाता।

संयुक्त स्वरूप: राधा और कृष्ण दो अलग-अलग सत्ता नहीं, बल्कि एक ही आत्मा के दो रूप हैं। कृष्ण को पुरुष (परमेश्वर) और राधा को प्रकृति (शक्ति) माना जाता है, जो साथ मिलकर पूर्णता का प्रतीक हैं।

निस्वार्थ प्रेम का प्रतीक: राधा-कृष्ण का प्रेम लौकिक प्रेम से ऊपर, आत्मा का परमात्मा से मिलन है। यह प्रेम निस्वार्थ, पवित्र और समर्पण का सर्वोच्च उदाहरण है।

ह्लादिनी शक्ति: शास्त्र राधाजी को कृष्ण की 'ह्लादिनी शक्ति' (आनंद प्रदान करने वाली शक्ति) कहते हैं। वे कृष्ण को आनंदित करती हैं और स्वयं भी आनंदित होती हैं।

ब्रज की लीलाएँ: कृष्ण ने अपनी बाल्यावस्था गोकुल/वृंदावन में राधाजी और गोपियों के साथ प्रेमपूर्ण लीलाओं में बिताईं।

भक्ति मार्ग: भक्त राधा-कृष्ण की पूजा करके राधाजी के माध्यम से कृष्ण को प्राप्त करने का मार्ग अपनाते हैं, क्योंकि राधाजी को कृष्ण की सबसे बड़ी भक्त माना जाता है।

अन्य नाम: राधाजी को राधिका, राधारानी, और कृष्ण को श्याम, कान्हा, मुरलीधर आदि नामों से भी जाना जाता है।

शिवालय

“ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥ ”

शिवलिंग पूजा का महत्व भगवान शिव के निराकार, अनंत और ब्रह्मांडीय स्वरूप से जुड़ना है। यह पूजा मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा, आत्मज्ञान और मोक्ष प्राप्ति का साधन है। शिवलिंग को सृष्टि के आदि और अंत के प्रतीक के रूप में पूजा जाता है, जो शिव (चेतना) और शक्ति (ऊर्जा) के मिलन को दर्शाता है।

भगवान शिव परिवार

“यस्यांके च विभाति भूधरसुता, देवापगा मस्तके। भाले बालविधुर्गले च गरलं, यस्योरसि व्यालराट्॥
सोऽयं भूतिविभूषणः सुरवरः, सर्वाधिपः सर्वदा। शर्वः सर्वगतः शिवः शशिनिभः, श्रीशंकरः पातु माम्॥ ”

यस्यांके च विभाति भूधरसुता: जिनकी गोद में पार्वती (पर्वतराज की पुत्री) सुशोभित हैं।
देवापगा मस्तके: जिनके मस्तक पर गंगाजी विराजमान हैं।
भाले बालविधुर्गले च गरलं: जिनके मस्तक (ललाट) पर बाल चंद्रमा (दूज का चाँद) और गले में विष (हलाहल) है।
यस्योरसि व्यालराट्: जिनके वक्षस्थल पर साँपों के राजा (शेषनाग/वासुकी) हैं।
सोऽयं भूतिविभूषणः सुरवरः वे भस्म (भूति) से विभूषित, देवताओं में श्रेष्ठ (सुरवर)।
सर्वाधिपः सर्वदा: हमेशा सबके स्वामी (सर्वाधिप)।
शर्वः सर्वगतः शिवः शशिनिभः सर्वव्यापी, मंगलमय (शिव), चंद्रमा के समान प्रकाशमान।
श्रीशंकरः पातु माम्: वे श्री शंकर जी (शिव) मेरी रक्षा करें।

श्री नंदी जी महाराज

“ ॐ महाकालयम महावीर्यं शिव वाहनं उत्तमम, गणनामत्वा प्रथम वन्दे नंदिश्वरम महाबलम॥  ”

नंदी जी (नंदीश्वर महाराज) भगवान शिव के सबसे प्रिय गण और वाहन हैं। नंदी जी के बाएं कान में मनोकामना कहना चाहिए। सबसे पहले कान में 'ॐ' का उच्चारण करें, फिर अपनी बात कहें।

श्री शनि देव महाराज

“ ॐ शं शनैश्चराय नमः ”

शनि देव हिंदू धर्म में ग्रहों के राजा, न्याय के देवता और कर्मफलदाता (कर्मों के अनुसार फल देने वाले) माने जाते हैं। सूर्य देव और माता छाया के पुत्र शनिदेव को अनुशासित, कठोर और कर्मों का हिसाब रखने वाला देवता माना जाता है, जो गलत कार्य करने पर दंड और अच्छे कार्यों पर सुख देते हैं। शनि की कृपा से कॅरियर, आयु और संघर्ष में सफलता मिलती है।